पाठ्यक्रम: जीएस-2/ शासन व्यवस्था एवं संविधान
सन्दर्भ
- सरकार ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि “क्रीमी लेयर” की अवधारणा को अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण पर लागू नहीं किया जा सकता।
परिचय
- पृष्ठभूमि: सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ दायर की गई थीं, जिनमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की तरह SC/ST की आरक्षित श्रेणियों के भीतर भी क्रीमी लेयर को बाहर करने की मांग की गई थी।
- न्यायालय ने 2024 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, जिसने SC/ST के भीतर उप-वर्गीकरण (Sub-categorisation) का मार्ग प्रशस्त किया था, के बाद केंद्र सरकार से की गई कार्रवाई की रिपोर्ट (Action Taken Report) भी दाखिल करने को कहा था।
- सरकार का पक्ष: सरकार ने तर्क दिया कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत अब तक केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) पर ही लागू किया गया है।
- SC/ST के लिए आय-आधारित क्रीमी लेयर की मांग न तो कोई संवैधानिक प्रश्न उठाती है और न ही संविधान के अंतर्गत किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन को दर्शाती है।
- आरक्षण नीति केवल आर्थिक स्थिति पर आधारित नहीं है, बल्कि जनजातीय पहचान, सामाजिक पिछड़ापन और जाति जैसे ऐतिहासिक एवं सामाजिक मानदंडों पर आधारित है।
- आरक्षित श्रेणियों में विशेषकर आय-आधारित प्राथमिकताओं को शामिल करने जैसा कोई भी संशोधन समग्र समीक्षा एवं विस्तृत अनुभवजन्य अध्ययन के बाद ही किया जा सकता है।
भारत में आरक्षण
- वर्तमान प्रावधानों के अनुसार, अखिल भारतीय स्तर पर प्रत्यक्ष भर्ती में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए क्रमशः 15%, 7.5% और 27% आरक्षण प्रदान किया जाता है।
- भारतीय संविधान (103वाँ संशोधन) अधिनियम, 2019 राज्य (केंद्र एवं राज्य सरकारों) को समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए आरक्षण प्रदान करने का अधिकार देता है।
क्रीमी लेयर सिद्धांत
- यह एक ऐसी अवधारणा है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ किसी वर्ग के भीतर वास्तव में आर्थिक एवं सामाजिक रूप से वंचित लोगों तक पहुँचे।
- इसका उद्देश्य आरक्षित वर्ग के अपेक्षाकृत समृद्ध या अधिक लाभान्वित सदस्यों को आरक्षण का लाभ लेने से रोकना है।
- उत्पत्ति: इस अवधारणा को पहली बार 1992 के इंद्रा साहनी वाद (मंडल आयोग मामला) में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रतिपादित किया था।
- न्यायालय ने कहा था कि OBC वर्ग के भीतर जो अपेक्षाकृत अधिक विशेषाधिकार प्राप्त हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
- प्रभाव: क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करने से सरकार की सकारात्मक भेदभाव (Affirmative Action) नीतियाँ अधिक प्रभावी एवं न्यायसंगत बनती हैं तथा वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुँचता है।
आरक्षण से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 16: सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता प्रदान करता है, किंतु अपवादस्वरूप राज्य ऐसे पिछड़े वर्गों के पक्ष में नियुक्तियों या पदों में आरक्षण दे सकता है, जिनका राज्य सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
- अनुच्छेद 16(4A): यदि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का राज्य सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो राज्य पदोन्नति में उनके लिए आरक्षण का प्रावधान कर सकता है।
- अनुच्छेद 335: यह मान्यता देता है कि SC/ST के दावों पर विचार करते समय उन्हें सेवाओं एवं पदों में समान स्तर पर लाने के लिए विशेष उपाय आवश्यक हैं।
- भारतीय संविधान का 103वाँ संशोधन: समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान करता है।
अनुसूचित जातियों (SC) के उप-वर्गीकरण पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
- वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने 6:1 के बहुमत से अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण की वैधता को बरकरार रखा तथा E.V. Chinnaiah बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2004) में पाँच-न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय को पलट दिया।
- न्यायालय ने कहा कि SC/ST में क्रीमी लेयर की पहचान के मानदंड OBC से भिन्न होने चाहिए।
2024 के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय के तर्क:
- अनुच्छेद 14 के अंतर्गत समानता का अर्थ समान लोगों के साथ समान व्यवहार करना है, लेकिन यह राज्य को भिन्न परिस्थितियों वाले समूहों का वर्गीकरण करने की अनुमति भी देता है।
- यदि कोई आरक्षित वर्ग (जैसे अनुसूचित जाति) आंतरिक रूप से एकरूप नहीं है, तो लाभों के न्यायसंगत वितरण के लिए राज्य उसके भीतर छोटे समूह बना सकता है।
- एकरूप नहीं: अनुच्छेद 341 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा जारी सूची एक वैधानिक कल्पना (Legal Fiction) है, जिसका उद्देश्य वंचित समूहों की पहचान करना है, न कि उन्हें एक समान वर्ग मानना।
- SC सूची में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि लक्षित लाभों के लिए आगे वर्गीकरण नहीं किया जा सकता।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उप-वर्गीकरण निम्न आधारों पर होना चाहिए:
- परिमाणात्मक (Quantifiable) आँकड़े;
- अधिक वंचित होने का प्रमाण;
- सार्वजनिक सेवाओं में अपर्याप्त एवं अप्रभावी प्रतिनिधित्व का साक्ष्य;
- राज्य मनमाना वर्गीकरण न करें, बल्कि उसका तर्क एवं अनुभवजन्य आधार प्रस्तुत करें;
- केवल संख्यात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि प्रभावी प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है।
पक्ष में तर्क
- SC के भीतर असमान पिछड़ापन: SC समुदायों की कुछ जातियाँ अन्य की तुलना में अधिक सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़ी हैं तथा लगातार कम प्रतिनिधित्व में रही हैं।
- असमान लोगों के साथ समान व्यवहार करना असमानता को बनाए रखता है और आरक्षण के उद्देश्य को विफल करता है।
- एकरूप नहीं: अनुच्छेद 341 के अंतर्गत SC सूची सकारात्मक भेदभाव के लिए बनाई गई एक वैधानिक कल्पना है।
- तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि सूची में शामिल होने का अर्थ यह नहीं कि सभी जातियाँ समान हैं; कानून को आंतरिक भिन्नताओं को स्वीकार करना चाहिए।
- संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार देते हैं।
- प्रभावी प्रतिनिधित्व को बढ़ावा: उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि वास्तविक एवं प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। उप-वर्गीकरण इससे सहायता कर सकता है।
- अनुभवजन्य आँकड़ों पर आधारित: इससे सरकार वहाँ सकारात्मक भेदभाव की नीतियाँ लागू कर सकती है, जहाँ उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
विरोध में तर्क
- अनुच्छेद 341: SC सूची में संशोधन का अधिकार केवल राष्ट्रपति को है। राज्यों द्वारा उप-वर्गीकरण को सूची में अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप तथा राज्य की शक्तियों से परे माना जाता है।
- समुदाय के भीतर विभाजन: उप-कोटा SC समुदायों के भीतर जाति-आधारित विभाजन को बढ़ा सकता है तथा उनकी सामूहिक राजनीतिक शक्ति एवं सामाजिक एकजुटता को कमजोर कर सकता है।
- मानदंड तय करने की चुनौती: SC के भीतर वंचितता मापने के लिए वस्तुनिष्ठ एवं अनुभवजन्य मानदंड निर्धारित करना कठिन है। इससे गलत वर्गीकरण एवं कानूनी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
- क्रीमी लेयर बहस को बढ़ावा: SC के लिए क्रीमी लेयर लागू करने से उन्हें प्राप्त संवैधानिक संरक्षण कमजोर पड़ सकता है। SC का आरक्षण केवल आर्थिक पिछड़ेपन पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भेदभाव एवं सामाजिक कलंक पर आधारित है, जो आय बढ़ने के बाद भी बना रह सकता है।
आगे की राह
- संवैधानिक सीमाओं के भीतर: सुनिश्चित किया जाए कि उप-वर्गीकरण अनुच्छेद 14, 15(4), 16(4) के अनुरूप हो तथा अनुच्छेद 341 के अंतर्गत राष्ट्रपति की सूची में कोई परिवर्तन न करे।
- क्रीमी लेयर की लागू करने की संभावना का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन: यदि SC/ST पर लागू किया जाए, तो OBC से अलग मानदंड निर्धारित किए जाएँ ताकि इन समूहों को प्राप्त ऐतिहासिक संरक्षण कमजोर न हो।
- सामाजिक उत्थान के उपायों को सुदृढ़ करना: आरक्षण के साथ लक्षित शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता सहायता तथा भेदभाव-रोधी कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन को भी बढ़ावा दिया जाए।
- सामाजिक समरसता को बढ़ावा: नीतिगत परिवर्तनों के साथ जागरूकता अभियान चलाए जाएँ, ताकि SC समुदायों के भीतर विभाजन न हो और सामूहिक उत्थान की भावना बनी रहे।
स्रोत: TH
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